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Wednesday, 29 April 2015

धुप है क्या और साया क्या

कुछ पल जगजीत सिंह के नाम 


धुप  है क्या और साया क्या



धुप  है क्या और साया क्या है अब मालूम हुआ ,

ये सब खेल तमाशा क्या है अब मालूम हुआ ,


हँसते फूल का चेहरा देखूं और भर आई आँख ,

अपने साथ ये किस्सा क्या है अब मालूम हुआ ,


हम बरसों के बाद भी उनको अब तक भूल न पाए ,

दिल से उनका रिश्ता क्या है अब मालूम हुआ ,


सेहरा सेहरा प्यासे भटके सारी उम्र जले ,

बादल का इक टुकड़ा क्या है अब मालूम हुआ .... 



 

Sunday, 26 April 2015

देखा जो आइना तो मुझे सोचना पड़ा

देखा जो आइना तो मुझे सोचना पड़ा 

कुछ पल जगजीत सिंह के नाम 

देखा जो आइना तो मुझे सोचना पड़ा,
खुद से न मिल सका तो मुझे सोचना पड़ा,

उसका जो खत मिला तो मुझे सोचना पड़ा,
अपना सा वो लगा तो मुझे सोचना पड़ा,

मुझको था गुमान के मुझी में है एक अना,
देखा तेरी अना तो मुझे सोचना पड़ा,

दुनिया समझ रही थी के नाराज मुझसे है,
लेकिन वो जब मिला तो मुझे सोचना पड़ा,

एक दिन वो मेरे एब गिनाने लगा करार,
जब खुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा,