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Sunday, 17 May 2015
Hindi Kavita Poem on Love
Hindi Kavita Poem on Love
Hindi Love Kavita
वोह जमाना कुछ और था..
तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था..
होमेवोर्क के बहाने ,
तुजसे मिलने का बहाना कुछ और था.
रिसेस में पराठो का चुपके से खिलाना
वोह मासूम याराना कुछ और था..
प्यार में दोस्ती. दोस्ती में प्यार..
लब्जो का वोह तराना कुछ और था..
एक अरसे बाद निकला था तेरी गली से
जो रोशन हुआ करती थी तेरी हसी से
कदम बस ठहर से गये
साँसे दो पल को जैसे थम सी गयी
फिर दिल को ये गुमान आया
वोह किस्सा पुराना कुछ और था
तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था
वोह जमाना कुछ और था..वोह जमाना कुछ और था..
वोह जमाना कुछ और था..
तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था..
होमेवोर्क के बहाने ,
तुजसे मिलने का बहाना कुछ और था.
रिसेस में पराठो का चुपके से खिलाना
वोह मासूम याराना कुछ और था..
प्यार में दोस्ती. दोस्ती में प्यार..
लब्जो का वोह तराना कुछ और था..
एक अरसे बाद निकला था तेरी गली से
जो रोशन हुआ करती थी तेरी हसी से
कदम बस ठहर से गये
साँसे दो पल को जैसे थम सी गयी
फिर दिल को ये गुमान आया
वोह किस्सा पुराना कुछ और था
तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था
वोह जमाना कुछ और था..वोह जमाना कुछ और था..
शब्द ( WORDS )
शब्द
शब्द अंतर में आकार लेते हे
शब्द सब कुछ कह देते हे।
इन शब्दों का संसार निराला हे
कुछ धोला तो कुछ काला हे।
ये शब्द कभी लड़ा देते हे
कभी प्यार बढ़ा देते हे।
उलजने उलजती शब्दों से
उलजने सुलजति भी शब्दों से।
विकल हर्दय को बल देते
कभी असक्त बना देते हे।
हर भाव को शब्द अभिव्यक्त करते
कभी ये दूर कभी आसक्त करते।
यु तो ये जुबान से निकलते हे
होते असमर्थ तो आँखों से भी टपकते हे।
शब्दों का सामर्थ्य अनंत होता हे
इनके साथ कोई हँसता कोई रोता हे।
शब्दों के साधक नायक बन जाते हे
इनसे अनजान खलनायक बन जाते हे।
भाषाओ का संसार शब्दों से चलता हे
तडपते कवि बिरहन का जैसे मन मचलता हे।
प्यार भरे शब्दों से सब पास आ जाते हे
सचमुच, सटीक शब्दों से सब काम बन जाते हे।
शब्द अंतर में आकार लेते हे
शब्द सब कुछ कह देते हे।
इन शब्दों का संसार निराला हे
कुछ धोला तो कुछ काला हे।
ये शब्द कभी लड़ा देते हे
कभी प्यार बढ़ा देते हे।
उलजने उलजती शब्दों से
उलजने सुलजति भी शब्दों से।
विकल हर्दय को बल देते
कभी असक्त बना देते हे।
हर भाव को शब्द अभिव्यक्त करते
कभी ये दूर कभी आसक्त करते।
यु तो ये जुबान से निकलते हे
होते असमर्थ तो आँखों से भी टपकते हे।
शब्दों का सामर्थ्य अनंत होता हे
इनके साथ कोई हँसता कोई रोता हे।
शब्दों के साधक नायक बन जाते हे
इनसे अनजान खलनायक बन जाते हे।
भाषाओ का संसार शब्दों से चलता हे
तडपते कवि बिरहन का जैसे मन मचलता हे।
प्यार भरे शब्दों से सब पास आ जाते हे
सचमुच, सटीक शब्दों से सब काम बन जाते हे।
Saturday, 16 May 2015
Veer Tum Badhe Chalo - वीर तुम बढ़े चलो
Veer Tum Badhe Chalo -वीर तुम बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं
सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
एक ध्वज लिये हुए
एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये
पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
अन्न भूमि में भरा
वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो
रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
-द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी
धीर तुम बढ़े चलो
साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं
सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
एक ध्वज लिये हुए
एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये
पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
अन्न भूमि में भरा
वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो
रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
-द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी
सब याद आता है
सब याद आता है
वो मुड़कर हमें देखना,
वो हंसी का एक झोंका,
वो हमें छेड़ देना,
फिर प्यार से मना लेना,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो तुम्हारी शैतानियां,
वो प्यारी सी ठिठोलियाँ,
वो हमें गले लगाना,
फिर हंसकर भाग जाना,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो हाथ पकड़ना,
मोहब्बत आँखों में भरना,
वो आंसूं छलक जाना,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो यादों का पालना,
वो खवाबों का घरोंदा,
वो बिस्तेर की सलवट,
वो नैनों का झरोका,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो हंसी का एक झोंका,
वो हमें छेड़ देना,
फिर प्यार से मना लेना,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो तुम्हारी शैतानियां,
वो प्यारी सी ठिठोलियाँ,
वो हमें गले लगाना,
फिर हंसकर भाग जाना,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो हाथ पकड़ना,
मोहब्बत आँखों में भरना,
वो आंसूं छलक जाना,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो यादों का पालना,
वो खवाबों का घरोंदा,
वो बिस्तेर की सलवट,
वो नैनों का झरोका,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
। असली गरीब मैं हूँ या तुम?
Asli Garib Mai Hu Ya Tum ?
मै प्रखर आप सब के लिये लाया हूँ अपनी लिखी एक कविता का कुछ भाग । ये कविता उस स्थिति का वर्णन करती है जब एक गरीब इंसान को इतना सताया जाता है कुछ अमीरों द्वारा तो उसके मन में कई तरह के प्रश्न उठते हैं उसी को इसके माध्यम से दर्शाया है मैंने। कविता का शीर्षक है “असली गरीब मैं हूँ या तुम?” कैसी लगी ये बताना मत भूलिएगा।
। असली गरीब मैं हूँ या तुम?
तुम तो तरसते हो चैन की नींद सोने को,
हमारा क्या है? हमारे पास क्या है खोने को?
हम जैसों का दिनभर खून पीते हो,
हमेशा चोर लफंगो से डर कर जीते हो।
तुम्हारे चेहरे से मासूमियत हो गई है बिल्कुल गुम,
अब बताओ असली गरीब मै हूँ या तुम?
एक बात बताओ जरा,
तुम हम पर क्यूँ इतना जुल्म ढ़ाते हो?
खुद गल्तियाँ करके ढ़ेरों ,
हमें उसमें क्यूँ फंसाते हो?
फिजूलखर्च करने को,
समझते हो अपनी शान।
जब आती है बारी हमें तनख्वाह देने की,
तो क्यूँ लेते हो सीना तान?
क्या इसमें भी मेरा ही है कोई जुर्म ?
अब बताओ असली गरीब मैं हूँ या तुम?
। असली गरीब मैं हूँ या तुम?
तुम तो तरसते हो चैन की नींद सोने को,
हमारा क्या है? हमारे पास क्या है खोने को?
हम जैसों का दिनभर खून पीते हो,
हमेशा चोर लफंगो से डर कर जीते हो।
तुम्हारे चेहरे से मासूमियत हो गई है बिल्कुल गुम,
अब बताओ असली गरीब मै हूँ या तुम?
एक बात बताओ जरा,
तुम हम पर क्यूँ इतना जुल्म ढ़ाते हो?
खुद गल्तियाँ करके ढ़ेरों ,
हमें उसमें क्यूँ फंसाते हो?
फिजूलखर्च करने को,
समझते हो अपनी शान।
जब आती है बारी हमें तनख्वाह देने की,
तो क्यूँ लेते हो सीना तान?
क्या इसमें भी मेरा ही है कोई जुर्म ?
अब बताओ असली गरीब मैं हूँ या तुम?
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