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Friday, 29 May 2015

(हिंदी कविता) जेब पर भारी ये महँगाई


जेब पर भारी ये महँगाई

आज निकला था बाजार चलो कुछ घुमा-फिरी हो जाए
मूंगफली के ठेले वाले से बोला भाई सौ ग्राम मूंगफली तो दो
बोला दस रुपये, जेब में हाथ डाला निकले पांच रूपए कुल
पांच रूपये कुल यार समय ये क्या बन आया
महँगाई ही इतनी है यार बचा इतना ही पाया
महँगाई इतनी है ना पूछो हाल
तंग है जेब ढीली है चाल
सोचा एक सेब खा लू बोला सेब वाले को एक सेब
बोला पन्द्रह रूपये का एक सेब
जेब में हाथ डाला, निकले पांच रूपये कुल यार
पांच रूपये कुल यार समये ये क्या बन आया
महँगाई ही इतनी हे यार बचा इतना ही पाया
इससे तो अच्छा था हाल
जब हम थे बाल
पिता की जेब पर था हमारा हाल
जेब में हाथ डाला करते थे
चार आने निकला करते थे
उस में हम सेब भी खाया करते थे
और मूंगफली भी चबाया करते थे
और पैसे भी बच जाया करते थे
जेब में पैसा ले जाया करते थे
भर-भर थैला ले आया करते थे
और आज है ये हाल
कहने को तो हम जेंटल मैन,
पर खाली जेब मटकाते नैन
इस महँगाई का ना पूछो हाल
इससे से तो अच्छी थी अपनी धन्नो की चाल
चलती थी बढती थी दिखती थी
मगर इस महँगाई का ना पूछो हाल
इसकी ना चाल दिखती हे ना ढाल दिखती है
ये महँगाई हे, ये पर लगा कर उड़ती है
                                                                                                                       v'kksd dqekj
                                                    ¼ubZ fnYyh½


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(हिंदी कविता)



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Sunday, 17 May 2015

दुल्हन


दुल्हन

सेज पर बैठी एक दुल्हन,
पिया का इंतज़ार कर रही थी,
अब आयेगा पिया यह सोचकर,
मन ही मन मुस्कुरा रही थी,
आँखें झुकी मन में प्यार,
पलके झुकाए कर रही थी पिया का इंतज़ार.
इंतज़ार की घडी ख़तम हुयी,
उमंग के दरवाज़े खुले,
काश यह लम्हा यूँ ही थम जाता,
और सिर्फ तुम होते, और हम होते…..

Hindi Kavita Poem on Love

Hindi Kavita Poem on Love


Hindi Love Kavita

वोह जमाना कुछ और था..
तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था..
होमेवोर्क के बहाने ,
तुजसे मिलने का बहाना कुछ और था.

रिसेस में पराठो का चुपके से खिलाना
वोह मासूम याराना कुछ और था..
प्यार में दोस्ती. दोस्ती में प्यार..
लब्जो का वोह तराना कुछ और था..

एक अरसे बाद निकला था तेरी गली से
जो रोशन हुआ करती थी तेरी हसी से
कदम बस ठहर से गये
साँसे दो पल को जैसे थम सी गयी
फिर दिल को ये गुमान आया
वोह किस्सा पुराना कुछ और था

तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था
वोह जमाना कुछ और था..वोह जमाना कुछ और था..

शब्द ( WORDS )

शब्द
शब्द अंतर में आकार लेते हे
शब्द सब कुछ कह देते हे।
इन शब्दों का संसार निराला हे
कुछ धोला तो कुछ काला हे।
ये शब्द कभी लड़ा देते हे
कभी प्यार बढ़ा देते हे।
उलजने उलजती शब्दों से
उलजने सुलजति भी शब्दों से।
विकल हर्दय को बल देते
कभी असक्त बना देते हे।
हर भाव को शब्द अभिव्यक्त करते
कभी ये दूर कभी आसक्त करते।
यु तो ये जुबान से निकलते हे
होते असमर्थ तो आँखों से भी टपकते हे।
शब्दों का सामर्थ्य अनंत होता हे
इनके साथ कोई हँसता कोई रोता हे।
शब्दों के साधक नायक बन जाते हे
इनसे अनजान खलनायक बन जाते हे।
भाषाओ का संसार शब्दों से चलता हे
तडपते कवि बिरहन का जैसे मन मचलता हे।
प्यार भरे शब्दों से सब पास आ जाते हे
सचमुच, सटीक शब्दों से सब काम बन जाते हे।

Saturday, 16 May 2015

Veer Tum Badhe Chalo - वीर तुम बढ़े चलो

Veer Tum Badhe Chalo -वीर तुम बढ़े चलो
   
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं
सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
एक ध्वज लिये हुए
एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये
पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
अन्न भूमि में भरा
वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो
रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
-द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

सब याद आता है

सब याद आता है

वो मुड़कर हमें देखना,
वो हंसी का एक झोंका,
वो हमें छेड़ देना,
फिर प्यार से मना लेना,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो तुम्हारी शैतानियां,
वो प्यारी सी ठिठोलियाँ,
वो हमें गले लगाना,
फिर हंसकर भाग जाना,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो हाथ पकड़ना,
मोहब्बत आँखों में भरना,
वो आंसूं छलक जाना,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.
वो यादों का पालना,
वो खवाबों का घरोंदा,
वो बिस्तेर की सलवट,
वो नैनों का झरोका,
सब याद आता है,
होठों पे मुस्कान दे जाता है.

दुल्हन


दुल्हन

सेज पर बैठी एक दुल्हन,
पिया का इंतज़ार कर रही थी,
अब आयेगा पिया यह सोचकर,
मन ही मन मुस्कुरा रही थी,
आँखें झुकी मन में प्यार,
पलके झुकाए कर रही थी पिया का इंतज़ार.
इंतज़ार की घडी ख़तम हुयी,
उमंग के दरवाज़े खुले,
काश यह लम्हा यूँ ही थम जाता,
और सिर्फ तुम होते, और हम होते…..

। असली गरीब मैं हूँ या तुम?


Asli Garib Mai Hu Ya Tum ?

मै प्रखर आप सब के लिये लाया हूँ अपनी लिखी एक कविता का कुछ भाग । ये कविता उस स्थिति का वर्णन करती है जब एक गरीब इंसान को इतना सताया जाता है कुछ अमीरों द्वारा तो उसके मन में कई तरह के प्रश्न उठते हैं उसी को इसके माध्यम से दर्शाया है मैंने। कविता का शीर्षक है “असली गरीब मैं हूँ या तुम?” कैसी लगी ये बताना मत भूलिएगा।
असली गरीब मैं हूँ या तुम?
तुम तो तरसते हो चैन की नींद सोने को,
हमारा क्या है? हमारे पास क्या है खोने को?
हम जैसों का दिनभर खून पीते हो,
हमेशा चोर लफंगो से डर कर जीते हो।
तुम्हारे चेहरे से मासूमियत हो गई है बिल्कुल गुम,
अब बताओ असली गरीब मै हूँ या तुम?
एक बात बताओ जरा,
तुम हम पर क्यूँ इतना जुल्म ढ़ाते हो?
खुद गल्तियाँ करके ढ़ेरों ,
हमें उसमें क्यूँ फंसाते हो?
फिजूलखर्च करने को,
समझते हो अपनी शान।
जब आती है बारी हमें तनख्वाह देने की,
तो क्यूँ लेते हो सीना तान?
क्या इसमें भी मेरा ही है कोई जुर्म ?
अब बताओ असली गरीब मैं हूँ या तुम?

Hindi Kavita Poem on Love

Hindi Kavita Poem on Love
Hindi Love Kavita

वोह जमाना कुछ और था..
तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था..
होमेवोर्क के बहाने ,
तुजसे मिलने का बहाना कुछ और था.

रिसेस में पराठो का चुपके से खिलाना
वोह मासूम याराना कुछ और था..
प्यार में दोस्ती. दोस्ती में प्यार..
लब्जो का वोह तराना कुछ और था..

एक अरसे बाद निकला था तेरी गली से
जो रोशन हुआ करती थी तेरी हसी से
कदम बस ठहर से गये
साँसे दो पल को जैसे थम सी गयी
फिर दिल को ये गुमान आया
वोह किस्सा पुराना कुछ और था

तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था
वोह जमाना कुछ और था..वोह जमाना कुछ और था..

कर्फ्यू की चिंता

कर्फ्यू की चिंता 




कर्फ्यू की चिंता
सुना है दंगे भड़के है फिर
पुरे शहर में लगा है कर्फ्यू
नही पता दंगे के कारण का
चाहे जातिवाद हो या सम्‍प्रदायवाद
कारण से मुझे लेना देना भी नही
भूखे पेट को कारण से वास्‍ता भी नही
मुझे तो चिंता है कर्फ्यू  के लगने की
कर्फ्यू का नाम सुनते ही उड़ गए मेरे होश
काम गया, मजदूरी गयी, आज के दिन की
रोजाना काम की करता हूँ तलाश
काम के वेतन से लाता हूँ राशन
लेकिन आज वह भी नसीब नही
आज गैरहाजरी लगी मेरे रोजगार की

आज गैरहाजरी लगी हमारे खाने की
राशन लाता था रोजाना की कमाई से
बने खाने को खाते थे हम बॉंटकर
आज मेरा परिवार रहेगा भूखा
चिंता नही है भूखे काम पर जाने की
सोचता हूँ जितेजी चिंता मिटेगी क्‍या
चिंता आज भी है कल भी रहेगी
कल रहेगी चिंता भय की, असुरक्षा की
कल रहेगी चिंता जातिगत तनाव की
कल रहेगी चिंता मंदिर मस्जिद के झगड़े की
आज की चिंता है भूख से मरने की
कल की चिंता होगी मारे जाने के डर की
आज की चिंता है कर्फ्यू  के लगने की
कल की चिंता है कर्फ्यू  के हटने की.

बचपन भी गज़ब था

बचपन भी गज़ब था 
  
कोनों में चप्पलें पड़ीं थीं
रस्ते में बस्ता रखा
और टीवी के सामने हम
बचपन भी गज़ब अनूठा था ।
खाने में माँ के हाथ से बने पराँठे
और पापा कि डांट
जिसपे दादु के लाड प्यार की मलाई ने था बिगाड़ा
बचपन भी गज़ब स्वाद था ।
शाम का क्रिकेट मैच होता था
दोस्तों से नियमों को लेके लड़ाई
और दोस्तों को टीम में लेके होती जीत
बचपन भी गज़ब खेल था ।
देश और दुनिया कि खबरों से दूर
खुद की भी सुध न होती थी
जब होता था हिस्ट्री का एग्जाम सर पे
बचन भी गज़ब सिखाता था ।
अब इन सबकी हैं तो बस यादें
आज को कल की खबर नहीं
पर चिंता ज़रूर रहती है
बचपन भी गज़ब पुराना था ।

एक ही तो सपना था मेरा

एक ही तो सपना था मेरा 
  
एक ही तो सपना था मेरा
आज वो भी टूट गया
जबसे होश संभाला
एक तेरा ही हाथ थामा
हर मोड़ हर पड़ाव से माँगा
गर तू है मंजिल तो परवाह नही कितना है फासला
न जाने कब आ खड़ा हुआ में इस जगह
न जाने किस पल तेरा हाथ छूट गया
एक ही तो सपना था मेरा
आज वो भी टूट गया।।
हर कदम साथ चले
हर जन्नत साथ जिए
हर जीत हर हार
हर डोर हर तार
हर दिवाली हर पतंग
ईद हो या होली के रंग
न जाने कब किस्मत का सिक्का पलटा
न जाने किस पल तू मुझे भूल गया
एक ही तो सपना था मेरा
आज वो भी टूट गया।।
हर राह चुनी मैने तेरे साथ के लिए
अरसा बीत गया आज खुद के लिए कुछ किये
मेरा हर सवाल हर जवाब जुड़ा था तुझसे
अरसा बीत गया आज बात किये खुदसे
जब छुटा आज साथ तेरा
दिखा मुझे अक्स मेरा
न दुखी है मन न दिल पर कोई निशानी है
ये कहूँ आज तो झूठी कहानी है
मुझमे फर्क है सिर्फ लिबास का
आज भी सांस तुझसे ही आती है
तेरा ही नाम है हर नस में
धड़कन गीत तेरे ही गाती है
न जाने कब बीत गए ये बारह साल
न जाने किस पल सब कुछ लुट गया
एक ही तो सपना था मेरा
आज वो भी टूट गया।।

(हिंदी कविता) - टकला

टकला


रमेश भाई को जब तक हुए बाल बच्चे,
उन्के सर के एक भी बाल नही बचे,
कुछ बच्चे उन्हे टकला टकला कह कर चिढाते,
तो कुछ सर पे मार के भाग जाते ।

सारे मुहल्ले मे किस्सा मश्हुर था,
कि इन्के बाल यो ही नही उङॆ बल्की ऊङाए गये है,
बेचारे पत्नी द्वारा बहुत सताए गये है,
घर मे बीबी की डाट पडती,
दफ़्तर मे बॉस देता धमकी,
तुमसे मेरी बर्षॊ पुरानी यारी है,
वर्ना काम मांगाने वालो मे आधी लड़किय़ाँ कुवाँरी है ।

जब दाढी बनवाने सैलून जाते ,नाई भी ईन पर चिल्लाते,
ससुरजी भी कहते कि अगर तू शादी के पहले टकला हो जाता,
तो हमारे दहेज़ का खर्चा बच जाता,
जब वो बच्चो को स्कुल छोड़ने जाते ,
बच्चे ईन्हे अपना नौकर बताते,
भाई आज के फैशन और खुबसुरती के ज़माने मे गंजा होना श्राप है,
अब बच्चे कैसे बताँए कि टकला उन्का बाप है ।

एक सामाजिक संस्था तो यँहा तक कहती है,
हर टकले को शादी करने से रोका जाए ,
कहीं ऐसा ना हो यह बिमारी पीढी दर पीढी फैलते फैलते,
सारा संसार टकला हो जाये ।

ऊधर एक फिलोसोफर का कहना है ,
जिन्की सोंच गिरी हुई होती है उन्के बाल जल्दी गिर जाते है,
ऐसे पतीतो को गोली मार देनी चाहिये ,
मुझे आशचर्य है वे खुद शर्म से क्यों नही मर जाते है ।

एक बडा खुशनसीब नौजवान था मतवाला ,
सर पे थे सुन्दर बाल , साथ में सुन्दर बाला,
देख कर जोड़ी रमेश भाई ऐसे खो गये,
जैसे चलते चलते हीं सो गये,
जब बाला के बालों ने गुदगुदी मचाया,
खुद को लड़की से लिपटे पाया,
नौजवान बोला-अबे टकला हो कर लाईन मारता है,
क्यों टकला होना क्या अपराध है,
लगता है आज हीं गंजे तेरा होने वाला श्राध है ।

ईस पर रमेश भाई के खून में भी गर्मी आई,
बोले-अबे ओ खरबुजे,चुहिया के साथ नाच रहे चूजे,
भगवान करे तूझे कैंसर हो,तूझे कोढ हो जाये,
तेरे घर में आग लगे ,तूझ पर आतंकवादी का हमला हो जाए,
तू तबेले में जाकर मरे,
बच्चे तेरे सर पे तबला बजाएँ ,
जा मैं तुझे श्राप देता हूँ,
जल्द हीं तू भी मेरी तरह टकला हो जाए !!!!

Thursday, 16 April 2015

(हिंदी कविता) आखिर हम कहां जाए

आखिर हम कहां जाए

मिर्च से तीखापन
चीनी से मीठापन
करेले का कड़वापन
दूध - घी का सौधापन
कहीं नदारद है
हम आखिर कहां जाए
इस महंगाई पर लानत है
दाल अब गलती नहीं
भाजी कहीं मिलती नहीं
क्या खांए, क्या ख़रीदे
रेजगारी चलती नहीं
पसीना भी अब फीका हुआ
नमक कंही नदारद है
हम आखिर कहाँ जाए
इस महंगाई पर लानत है
चावल ने पकना छोड़ा
गैहू ने सबसे मुंह मोड़ा
हल्दी पीली नहीं लगती
मसालों से खुसबू नहीं मिलती
पानी से गीलापन नदारद है
हम आखिर कहाँ जाए
इस महंगाई पर लागत है
खुशियां हुई डेबिट
परेशानियां है क्रेडिट
ब्याह हुआ मुश्किल
घर होता नहीं हासिल
हसरतों की सूची नदारद है
हम आखिर कहाँ जाए
इस महंगाई पर लानत है 


अशोक कुमार  

Wednesday, 15 April 2015

(हिंदी कविता) सपनो की हकीकत

सपनो की हकीकत 

आज के इस वक़्त में 
हमें कपड़ा, रोटी और मकान से ज्यादा 
और भी कुछ चाहिये 
पर महंगाई के उतार चढ़ाव के इस दौर में 
कुछ ज्यादा मिलने की उम्मीद हमें नहीं है 
हैरान परेशान होने के दिन अब लद गये है 
हमने मान लिया है रुपया हमारा बाप है 
और हमनें उसकी गुलामी स्वीकार कर ली है 
हम धीरे धीरे चलते हैं  
पर हमारे सपने हमसे भी तेज चलते का साहस रखते है 
हमारे कुछ सपने सिक्कों के सहारे खड़े है 
जब सिक्के गिरे तो सपने भी गिरे 
जो सपने फक्क्ड़ थे वे चलते चले गये 
हम समझ गये उसकी जमीनी हकीकत 
वें सपने चलते गये और दुनियादारी से 
बाहर होते गये 
कुछ लोग बाज़ार में खरीदने निकले 
लेकिन मन मार कर खरीद भी लाये 
और हम भी खरीदने निकले 
पर दाम सुन कर निरास हो लौट आये 
हमनें इस जग में बहुतों से 
जीतने का दावा किया 
पर बहुत कोशिशों के बाद भी 
हम मँहगाई से जीत नहीं पाये !


अशोक कुमार  



Tuesday, 14 April 2015

(हिंदी कविता) बढ़ती महंगाई

बढ़ती महंगाई 

भारत देश की सरकार निराली,

कही नहीं ऐसी पाओगे…… …
कहती 'कम होगी मंहगाई '
हर बरस बढ़ती पाओगे .......…
दो के छः और छः के बारह,
दाम सदा ही बढ़ता जाता,
सब्जी, चावल हो या आटा
दूर से हमको मुंह है चिढ़ाता !
अब खाली बैठे न हमसे,
चीनी यूँ  फांकी जाती है..........
एक चाय की कीमत भी तो,
पांच रुपए आंकी जाती है !
गरीब बेचारा क्या खायेगा …...
खुद को भी जो बेच आएगा.......
एक जून की रोटी भी तो,
बच्चो को नहीं दे पायेगा !
फल मिष्ठान तो बन गए सपना,
खाना मिल जाए क्या कम है …
खीर पूरी का गया जमाना,
सुखी रोटी, आँखे नम है। .........


अशोक कुमार