Saturday, 16 May 2015

Hindi Kavita Poem on Love

Hindi Kavita Poem on Love
Hindi Love Kavita

वोह जमाना कुछ और था..
तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था..
होमेवोर्क के बहाने ,
तुजसे मिलने का बहाना कुछ और था.

रिसेस में पराठो का चुपके से खिलाना
वोह मासूम याराना कुछ और था..
प्यार में दोस्ती. दोस्ती में प्यार..
लब्जो का वोह तराना कुछ और था..

एक अरसे बाद निकला था तेरी गली से
जो रोशन हुआ करती थी तेरी हसी से
कदम बस ठहर से गये
साँसे दो पल को जैसे थम सी गयी
फिर दिल को ये गुमान आया
वोह किस्सा पुराना कुछ और था

तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था
वोह जमाना कुछ और था..वोह जमाना कुछ और था..

कर्फ्यू की चिंता

कर्फ्यू की चिंता 




कर्फ्यू की चिंता
सुना है दंगे भड़के है फिर
पुरे शहर में लगा है कर्फ्यू
नही पता दंगे के कारण का
चाहे जातिवाद हो या सम्‍प्रदायवाद
कारण से मुझे लेना देना भी नही
भूखे पेट को कारण से वास्‍ता भी नही
मुझे तो चिंता है कर्फ्यू  के लगने की
कर्फ्यू का नाम सुनते ही उड़ गए मेरे होश
काम गया, मजदूरी गयी, आज के दिन की
रोजाना काम की करता हूँ तलाश
काम के वेतन से लाता हूँ राशन
लेकिन आज वह भी नसीब नही
आज गैरहाजरी लगी मेरे रोजगार की

आज गैरहाजरी लगी हमारे खाने की
राशन लाता था रोजाना की कमाई से
बने खाने को खाते थे हम बॉंटकर
आज मेरा परिवार रहेगा भूखा
चिंता नही है भूखे काम पर जाने की
सोचता हूँ जितेजी चिंता मिटेगी क्‍या
चिंता आज भी है कल भी रहेगी
कल रहेगी चिंता भय की, असुरक्षा की
कल रहेगी चिंता जातिगत तनाव की
कल रहेगी चिंता मंदिर मस्जिद के झगड़े की
आज की चिंता है भूख से मरने की
कल की चिंता होगी मारे जाने के डर की
आज की चिंता है कर्फ्यू  के लगने की
कल की चिंता है कर्फ्यू  के हटने की.

बचपन भी गज़ब था

बचपन भी गज़ब था 
  
कोनों में चप्पलें पड़ीं थीं
रस्ते में बस्ता रखा
और टीवी के सामने हम
बचपन भी गज़ब अनूठा था ।
खाने में माँ के हाथ से बने पराँठे
और पापा कि डांट
जिसपे दादु के लाड प्यार की मलाई ने था बिगाड़ा
बचपन भी गज़ब स्वाद था ।
शाम का क्रिकेट मैच होता था
दोस्तों से नियमों को लेके लड़ाई
और दोस्तों को टीम में लेके होती जीत
बचपन भी गज़ब खेल था ।
देश और दुनिया कि खबरों से दूर
खुद की भी सुध न होती थी
जब होता था हिस्ट्री का एग्जाम सर पे
बचन भी गज़ब सिखाता था ।
अब इन सबकी हैं तो बस यादें
आज को कल की खबर नहीं
पर चिंता ज़रूर रहती है
बचपन भी गज़ब पुराना था ।

एक ही तो सपना था मेरा

एक ही तो सपना था मेरा 
  
एक ही तो सपना था मेरा
आज वो भी टूट गया
जबसे होश संभाला
एक तेरा ही हाथ थामा
हर मोड़ हर पड़ाव से माँगा
गर तू है मंजिल तो परवाह नही कितना है फासला
न जाने कब आ खड़ा हुआ में इस जगह
न जाने किस पल तेरा हाथ छूट गया
एक ही तो सपना था मेरा
आज वो भी टूट गया।।
हर कदम साथ चले
हर जन्नत साथ जिए
हर जीत हर हार
हर डोर हर तार
हर दिवाली हर पतंग
ईद हो या होली के रंग
न जाने कब किस्मत का सिक्का पलटा
न जाने किस पल तू मुझे भूल गया
एक ही तो सपना था मेरा
आज वो भी टूट गया।।
हर राह चुनी मैने तेरे साथ के लिए
अरसा बीत गया आज खुद के लिए कुछ किये
मेरा हर सवाल हर जवाब जुड़ा था तुझसे
अरसा बीत गया आज बात किये खुदसे
जब छुटा आज साथ तेरा
दिखा मुझे अक्स मेरा
न दुखी है मन न दिल पर कोई निशानी है
ये कहूँ आज तो झूठी कहानी है
मुझमे फर्क है सिर्फ लिबास का
आज भी सांस तुझसे ही आती है
तेरा ही नाम है हर नस में
धड़कन गीत तेरे ही गाती है
न जाने कब बीत गए ये बारह साल
न जाने किस पल सब कुछ लुट गया
एक ही तो सपना था मेरा
आज वो भी टूट गया।।

(हिंदी कविता) - टकला

टकला


रमेश भाई को जब तक हुए बाल बच्चे,
उन्के सर के एक भी बाल नही बचे,
कुछ बच्चे उन्हे टकला टकला कह कर चिढाते,
तो कुछ सर पे मार के भाग जाते ।

सारे मुहल्ले मे किस्सा मश्हुर था,
कि इन्के बाल यो ही नही उङॆ बल्की ऊङाए गये है,
बेचारे पत्नी द्वारा बहुत सताए गये है,
घर मे बीबी की डाट पडती,
दफ़्तर मे बॉस देता धमकी,
तुमसे मेरी बर्षॊ पुरानी यारी है,
वर्ना काम मांगाने वालो मे आधी लड़किय़ाँ कुवाँरी है ।

जब दाढी बनवाने सैलून जाते ,नाई भी ईन पर चिल्लाते,
ससुरजी भी कहते कि अगर तू शादी के पहले टकला हो जाता,
तो हमारे दहेज़ का खर्चा बच जाता,
जब वो बच्चो को स्कुल छोड़ने जाते ,
बच्चे ईन्हे अपना नौकर बताते,
भाई आज के फैशन और खुबसुरती के ज़माने मे गंजा होना श्राप है,
अब बच्चे कैसे बताँए कि टकला उन्का बाप है ।

एक सामाजिक संस्था तो यँहा तक कहती है,
हर टकले को शादी करने से रोका जाए ,
कहीं ऐसा ना हो यह बिमारी पीढी दर पीढी फैलते फैलते,
सारा संसार टकला हो जाये ।

ऊधर एक फिलोसोफर का कहना है ,
जिन्की सोंच गिरी हुई होती है उन्के बाल जल्दी गिर जाते है,
ऐसे पतीतो को गोली मार देनी चाहिये ,
मुझे आशचर्य है वे खुद शर्म से क्यों नही मर जाते है ।

एक बडा खुशनसीब नौजवान था मतवाला ,
सर पे थे सुन्दर बाल , साथ में सुन्दर बाला,
देख कर जोड़ी रमेश भाई ऐसे खो गये,
जैसे चलते चलते हीं सो गये,
जब बाला के बालों ने गुदगुदी मचाया,
खुद को लड़की से लिपटे पाया,
नौजवान बोला-अबे टकला हो कर लाईन मारता है,
क्यों टकला होना क्या अपराध है,
लगता है आज हीं गंजे तेरा होने वाला श्राध है ।

ईस पर रमेश भाई के खून में भी गर्मी आई,
बोले-अबे ओ खरबुजे,चुहिया के साथ नाच रहे चूजे,
भगवान करे तूझे कैंसर हो,तूझे कोढ हो जाये,
तेरे घर में आग लगे ,तूझ पर आतंकवादी का हमला हो जाए,
तू तबेले में जाकर मरे,
बच्चे तेरे सर पे तबला बजाएँ ,
जा मैं तुझे श्राप देता हूँ,
जल्द हीं तू भी मेरी तरह टकला हो जाए !!!!

वो कभी मिल जाएँ तो - Wo Kabhi Mil Jaaein To (Ghulam Ali)

वो कभी मिल जाएँ तो - Wo Kabhi Mil Jaaein To (Ghulam Ali)

Lyrics By:  अख्तर शीरानी      
Performed By: गुलाम अली  


वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए 
रात दिन सूरत को देखा कीजिए 


चाँदनी रातों में इक-इक फूल को 
बे-खुदी कहती है सजदा कीजिए 
वो कभी मिल जाएँ  ……

जो तमन्ना बर न आए उम्र भर
उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए 
वो कभी मिल जाएँ  ……

इश्क की रंगीनियों में डूब कर 

चाँदनी रातों में रोया कीजिए 
वो कभी मिल जाएँ  ……


पूछ बैठे है हमारा हाल वो 
बे-खुदी तू ही बता क्या कीजिए 
वो कभी मिल जाएँ  ……

हम ही उस के इश्क के काबिल न थे 

क्यूँ किसी जालिम का शिकवा कीजिए 
वो कभी मिल जाएँ  ……

आगे (गाने में नहीं है):

आप ही ने दर्द-ए-दिल बख्शा हमें 
आप ही इस का मुदावा कीजिए 
वो कभी मिल जाएँ  ……

कहते है 'अख़्तर' वो सुन कर मेरे शेर 

इस तरह हमको न रुसवा कीजिए 
वो कभी मिल जाएँ  ……